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कागजों पर ‘स्कॉलर’, क्लास में ‘अनपढ़’: नरसिंहपुर के निजी स्कूलों में बिना डिग्री वाले शिक्षकों के भरोसे बच्चों का भविष्य!

ऊंची फीस, वीआईपी सुविधाएं और चमक-दमक के पीछे का काला सच; योग्य शिक्षकों के नाम पर पैरेंट्स से वसूली जा रही मोटी रकम, पढ़ाने के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति।

गाडरवारा/नरसिंहपुर।
निजी स्कूलों (Private Schools) की ऊंची-ऊंची इमारतें, एयर-कंडीशनर बसें, टाई-बेल्ट वाले यूनिफॉर्म और चमचमाते प्रॉस्पेक्टस… यह वो बाहरी चकाचौंध है जिसे दिखाकर नरसिंहपुर जिले और गाडरवारा में हर साल अभिभावकों की जेबें काटी जा रही हैं। लेकिन इस आलीशान दिखावे के अंदर का सच बेहद खोखला और डरावना है। जिले के अधिकांश नामी और तथाकथित ‘हाई-फाई’ स्कूलों में बच्चों का भविष्य ऐसे लोगों के हाथों में सौंप दिया गया है, जिनके पास खुद शिक्षक होने की न्यूनतम योग्यता (डिग्री) तक नहीं है।

दिखावे के लिए ‘अनुभवी स्टाफ’, हकीकत में 12वीं पास और कॉलेज ड्रॉपआउट

शिक्षा के अधिकार (RTE) और सीबीएसई/एमपी बोर्ड के कड़े नियम कहते हैं कि स्कूल में पढ़ाने वाले हर शिक्षक के पास बी.एड (B.Ed), डी.एल.एड (D.El.Ed) या संबंधित विषय में पोस्ट-ग्रेजुएशन होना अनिवार्य है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि स्कूल संचालक भारी मुनाफा कमाने के चक्कर में योग्य और अनुभवी शिक्षकों को नौकरी पर नहीं रखते, क्योंकि उन्हें ज्यादा सैलरी देनी पड़ेगी।

  • सस्ती लेबर का खेल: खर्च बचाने के लिए स्कूलों में 12वीं पास, कॉलेज के छात्रों या बिना किसी ट्रेनिंग वाले नौसिखियों को 4 से 6 हजार रुपये की मामूली पगार पर रख लिया जाता है।
  • फर्जी डिग्रियों का सहारा: शिक्षा विभाग के निरीक्षण से बचने के लिए कागजों पर कुछ और (योग्य शिक्षक) दिखाया जाता है, जबकि हकीकत में क्लास के अंदर कोई और ही पढ़ा रहा होता है।

फीस ‘इंटरनेशनल’, पढ़ाई ‘थर्ड क्लास’: अभिभावकों के साथ सरेआम धोखाधड़ी

पैरेंट्स इस उम्मीद में अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा (सालाना हजारों-लाखों रुपये) फीस के रूप में इन स्कूलों के काउंटर पर जमा करते हैं कि उनके बच्चों को देश के बेहतरीन शिक्षकों से शिक्षा मिल रही है।

  1. स्मार्ट क्लास का झांसा: योग्य शिक्षकों की कमी को छुपाने के लिए बच्चों को केवल कंप्यूटर स्क्रीन या ‘स्मार्ट क्लास’ के भरोसे छोड़ दिया जाता है।
  2. सवालों पर पाबंदी: जब बच्चे घर जाकर अपनी शंकाएं (Doubts) दूर नहीं कर पाते, तब अभिभावकों को समझ आता है कि स्कूल में सिर्फ खानापूर्ति हो रही है। यही कारण है कि बाद में बच्चों को उन्हीं शिक्षकों के घरों पर मोटी फीस देकर ‘कोचिंग’ जाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

सोया हुआ है जिला शिक्षा विभाग, निरीक्षण के नाम पर सिर्फ ‘चाय-पानी’

जनता के बीच यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर जिला शिक्षा विभाग (DEO) और स्थानीय प्रशासन इस खुली धांधली पर आंखें मूंदकर क्यों बैठा है? हर साल सत्र शुरू होने से पहले स्कूलों की मान्यता का नवीनीकरण (Renewal) होता है। तब शिक्षकों की डिग्रियां क्यों नहीं जांची जातीं? सूत्रों की मानें तो शिक्षा विभाग के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत और ‘महीने की बंधी कमाई’ के चलते इन स्कूल संचालकों के हौसले बुलंद हैं।

अभिभावक संघ ने दी चेतावनी: अब आर-पार की लड़ाई

गाडरवारा के जागरूक अभिभावकों का कहना है कि वे अब इस धोखाधड़ी को बर्दाश्त नहीं करेंगे। यदि प्रशासन ने जल्द ही एक विशेष जांच दल बनाकर सभी प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों के शैक्षणिक दस्तावेजों (Degrees) की जांच नहीं की, तो उग्र आंदोलन और चक्काजाम किया जाएगा।

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